हंसने की लगे सबको बीमारी
खुद ब खुद हंसे दुनिया सारी
राजू श्रीवास्तव पर हो बेकारी
हंसेंगे आप तो फेल कलाकारी
जैसे बढ़ रही इंसानी आबादी
वैसे बढ़ रहे हैं देखो शमशान
लेकिन मरने वालों की रोज
वहां पर बढ़ती जाती लाईन
Monday, December 31, 2007
नए साल में फेल हो कलाकारी
प्रस्तुतकर्ता
अविनाश वाचस्पति
पर
Monday, December 31, 2007
लेबल: कविता, नया साल, हंसने की बीमारी
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
3 टिप्पणियाँ:
नया वर्ष आपके लिए शुभ और मंगलमय हो।
बिल्कुल सत्य कहा है आपने। मान गए गुरू।
raju shrivastav bahut naraz hoga
एक टिप्पणी भेजें