पकड़े जायेंगे अब मन के विचार
ऐसा शुरू हो गया है जी उपचार
रिसर्चर कर रहे हैं सर्च पर सर्च
इसमें नहीं है वैसे तो कोई हर्ज
जो हम भूल जाते हैं नोट करना
अब नहीं है जरूरी इसको लिखना
बहुत से अच्छे विचार मिल जाएंगे
पर वे छपने से पहले चुराये जाएंगे
मन की करतूतें होंगी अब जग जाहिर
हमारे कारनामों को करतूतों में बदलेंगे
हम भी निकालेंगे इसका नया हल
सोचेंगे कुछ और लिखेंगे बहुत कुछ
Thursday, January 3, 2008
कारनामों को करतूतों में बदलेंगे
प्रस्तुतकर्ता
अविनाश वाचस्पति
पर
Thursday, January 03, 2008
लेबल: कविता, मन, सर्च पर सर्च
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2 टिप्पणियाँ:
जब शोधकार्य पूरा हो जाए तो अवश्य बताना। मैं अपनी पत्नी से पीडि़त हूं, पता ही नहीं चलता श्रीमती जी कब क्या करने वाली है।
त्यागी जी, आपने हर जन मन की बात कैसे पढ़ ली
मशीन रास्ते में मिली होगी आपने घात लगा पकड़ ली
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