Friday, January 18, 2008

चजइ - सात सौ का सदमा


गिर गया गिर गया गिर गया भैया
लुढ़क गया लुढ़क गया ता ता थैया
बाजार का पखेरु उड़ा टूट गया पैया
शेयर बह गये सेंसेक्स में डूबी नैया

भरा गिलास यों ही चटक गया रे
चमकदार शीशा तो खटक गया रे
सात सौ का सदमा पटक गया रे
कितने ही अरब ये गटक गया रे

इतिहास बना आज बिकवाली का
नोट नहीं चला जैसे टकसाली का
मान न बना देखो अब साली का
रुतबा बढ़ गया यारो घरवाली का

रच गया रचा गया एक इतिहास
गंभीर बात बनी है नहीं परिहास
खूब किया मन टन भर उल्लास
धैर्य करें धारण पूरे होंगे विलास

8 टिप्पणियाँ:

rajivtaneja ने कहा…

शेयर बाज़ार की बिगडी हालत को कविता में अच्छा उकेरा आपने....
साथ ही धैर्य धरने की उचित सलाह भी...
एक पंथ दो-दो काज...

Praveen ने कहा…

कविता के माध्यम से ७०० करोड़ लोगों की हकीकत ब्यां कर दी आपने अविनाश जी। मेरी निगाह में आप शेयर बाजार के रिलायंस कवि हो गए आज से। मान गए आपको।

पवन चंदन ने कहा…

कवि हो या शेयरी
धैर्य की लगाई हथकड़ी

सचिन लुधियानवी ने कहा…

नाश नाश नाश बाजार ने मिटाया पैसा
ये रिलायंस का खेल या वक्त ही ऐसा
जितना जो लूट ले, ले जाए घर
अभी तो और और टूटेंगे शेयर

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

वाह सचिन वाह
जड़ दिया छक्का

Vinod ने कहा…

टूटेंगे शेयर जुड़ जुड़ जायेंगे
निवेशक टूटेंगे
फिर न उठ पायेंगे
खेल है ये ऑपरेटर्स का
निवेशक का नहीं
ट्रेडर्स का।

Sarvesh ने कहा…

कविता मे बज़ाया है बम
शेयर बाज़ार बोला है धम
दीवाली है या दिवाला है
शेयर बाज़ार निराला है
कविता का खुल गया ताला है
शेयर बाज़ार मे लग गया जाला है

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

लो जाला साफ हो गया
अब शेयर बाज़ार बोल रहा है झम
टूटन टूट गई
अब नहीं टूटेंगे शेयर
खुल गई हथकडी